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रसुवा टनल रेस्क्यू: माउंटेन गाइड विक्रम कर्के की कहानी—दलदल में धंसना, ड्रम की बोट और जिंदा बचाने की उम्मीद

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ADHUNIK NEWS ,5 September 2026, (Update 7 October 2026, 2:30 AM UTC)
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विक्रम चिलिमे, त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3ए टनल के रेस्क्यू में शामिल हैं। नेपाल और भारतीय सेना के साथ चीन, साउथ कोरिया और पाकिस्तान की टीमें भी मैदान में हैं।

रसुवा की टनल में फंसे 100 से ज्यादा लोगों के रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल नेपाल माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के माउंटेन रेस्क्यू कोऑर्डिनेटर विक्रम कर्के का अनुभव असाधारण है। दो बार एवरेस्ट चढ़ चुके इस गाइड ने बताया कि टनल में घुसते ही जमीन निगलने लगी। “मैं टनल में रेस्क्यू के लिए घुसा, तो दलदल में धंसने लगा। जितना हिलता, उतना ही धंसता गया। फिर समझ आया कि यहां जमीन ही निगल रही है। मैं कमर तक धंसा था। निकलने में करीब एक घंटे लग गए। रसुवा की इस टनल में जो देखा, ऐसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ।”

विक्रम चिलिमे, त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3ए टनल के रेस्क्यू में शामिल हैं। नेपाल और भारतीय सेना के साथ चीन, साउथ कोरिया और पाकिस्तान की टीमें भी मैदान में हैं।

कब और कैसे शुरू हुआ ऑपरेशन
26 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे एक पुलिस अधिकारी का फोन आया। रसुवा में बड़ी तबाही की खबर सुनते ही विक्रम ने सात साथियों को इकट्ठा किया। खराब मौसम के कारण एक दिन काठमांडू में फंसे रहे। अगले दिन मोटरसाइकिल से रसुवा पहुंचे। पहले त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर इलाके में रेस्क्यू की कोशिश हुई, लेकिन सेना ने नीचे जाना सुरक्षित नहीं बताया। फिर टीम चिलिमे टनल की ओर मुड़ी।

चिलिमे टनल: ड्रम काटकर बनाई बोट, 90 मीटर अंदर पहुंचे
चिलिमे में पानी भरा था और अंदर जाना जोखिम भरा। विक्रम बताते हैं, “यहां मिट्टी पैर रखने पर सख्त लगती है, लेकिन वजन पड़ते ही धंसने लगती है।” पहले की टीमें 90-100 मीटर जाकर लौट रही थीं।
गृह मंत्री सुदन गुरंग के सुझाव पर ड्रम काटकर प्लाईवुड और फ्लोट सामग्री लगाकर बोट बनाई गई। टीम ने उस पर लेटकर करीब 90-95 मीटर तक आगे बढ़े। आगे रास्ता बंद था। दूसरी तरफ छह लोग फंसे हैं। हाथ से मिट्टी हटाकर आगे बढ़ना संभव नहीं था। टीम ने साफ कहा कि अब मड पंप, वाटर पंप और खुदाई मशीनों के बिना रेस्क्यू मुश्किल है।

टनल के अंदर एक चार मंजिला बिल्डिंग है, जिसमें खाने-पीने का सामान मौजूद है। अगर ऑक्सीजन पहुंचती रहे तो फंसे लोग जिंदा रह सकते हैं यही सबसे बड़ी उम्मीद है। लेकिन ऑक्सीजन पहुंचाने वाला रास्ता बंद है और संपर्क टूट चुका है। आवाज लगाने की कोशिश भी मलबे के कारण उस हिस्से तक नहीं पहुंची।

विक्रम कहते हैं, “अगर 100 मीटर के बाद का 40-50 मीटर का हिस्सा खोल दें तो शायद दूसरी तरफ पहुंच सकें। अभी पाइप के जरिए ऑक्सीजन पहुंचाना पहली प्राथमिकता है, लेकिन उसके लिए भी रास्ता खोलना पड़ेगा। हर दिन ड्रिल करके मिट्टी हटाते हैं, सेफ्टी लाइन लगाते हैं और पानी निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन दलदल फिर रास्ता रोक देता है।”

त्रिशूली-1 में चीन की टीम आगे
त्रिशूली-1 (216-टनल) काफी बड़ी है। दोनों तरफ से अंदर जाने की कोशिश हुई, लेकिन पानी और मिट्टी बाधा बने। चीन की टीम को टनल का अधिक अनुभव है। उनके पास बड़ी टीम और बेहतर उपकरण हैं। वे पावर हाउस के मुख्य हिस्से की ओर बढ़ चुके हैं और करीब 40-50 मीटर का हिस्सा बाकी है। वहां पहुंचने पर दूसरे हिस्से की ओर बढ़ेंगे।

यहां उम्मीद ज्यादा है क्योंकि टनल अंदर से इंटरकनेक्टेड हैं और हवा आने-जाने का रास्ता है। यहां से पहले ही 6-7 लोग बाहर निकाले जा चुके हैं। चिलिमे की स्थिति अलग है—अंदर जाने और लौटने का एक ही रास्ता है, इसलिए वहां ऑपरेशन सबसे चुनौतीपूर्ण है।रेस्क्यू टीमें मशीनों की मदद से लगातार प्रयास जारी रखे हुए हैं। अंदर फंसे लोगों की जान बचाने की लड़ाई अभी जारी है।

उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ से आगरा को जोड़ने वाले व्यस्त अलीगढ़-आगरा रोड पर गुरुवार सुबह एक भयावह सड़क दुर्घटना ने इलाके में दहशत फैला दी। सादाबाद-हाथरस मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध सिसोदिया ढाबे के ठीक पास रोडवेज की एक बस ओवरटेक के दौरान नियंत्रण खोते हुए आगे चल रहे ट्रक में पीछे से जोरदार टक्कर मार दी।

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